तालिबान की दूसरी प्रेस मीटिंग में शामिल हुई महिला पत्रकार

  • [By: Pramod DaulatRam || 2025-10-12 23:00 IST
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नई दिल्ली। अफगानिस्‍तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को न बुलाए जाने पर उठे विवाद पर तालिबान ने अपनी स्थिति साफ कर दी है। तालिबान ने इस मुद्दे पर पल्‍ला झाड़ते हुए कहा है कि हमने किसी महिला पत्रकार को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में आने से नहीं रोका था। महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस से दूर रखने के मुद्दे पर तालिबान के राजनीतिक चीफ सुहैल शाही ने सफाई देते हुए कहा, 'हमने किसी भी महिला पत्रकार को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में आने से नहीं रोका। इसके पीछे तालिबान का कोई हाथ नहीं था। हमारे बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है, लेकिन उन बातों में कोई सच्‍चाई नहीं है। अफगानिस्तान में भी महिला पत्रकारों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। हमारे यहां भी महिलाएं मीडिया संस्थानों में काम कर रही हैं। आमिर खान मुत्ताकी खुद ही महिला पत्रकारों से लगातार मिलते रहते हैं और उनके सवालों का जवाब देने से भी पीछे नहीं रहते हैं। फिर यहां भारत में उन्‍हें किसी महिला के सवाल पर क्‍यों ऐतराज होगा?

महिला पत्रकारों को प्रेस कांफ्रेंस में न बुलाकर तालिबान नेताओं की काफी फजीयत हुई जिसके चलते आज दूसरी प्रेस कांफ्रेंस में तालिबानी नेताओ ने महिला पत्रकारों को भी आमंत्रित किया और और प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्हें सबसे आगे बिठाया। 

दरअसल अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी भारत दौरे पर आये। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उनका स्वागत किया। वैसे आप जानते ही है कि भारत सरकार ने अभी तक अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार को मान्यता नहीं दी है। दूसरी और तालिबान सरकार ने भी भारत के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है। शायद यही वजह हैं कि किसी विदेशी सरकार को बिना मान्यता दिए ही वहां के विदेश मंत्री का स्वागत किया गया। वैसे भारत सरकार ने घोषणा की है कि जल्द ही अफगानिस्तान में फिर से भारतीय दूतावास खोला जायेगा। 

किस बात पर हुआ था बवाल: तालिबानी नेता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों की नो एंट्री पर बवाल हुआ था। दरअसल नई दिल्ली में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन था। लेकिन इस पत्रकार वार्ता में महिला पत्रकारों को बाहर ही रखा गया था। यानी महिला पत्रकारों को इस प्रेसवार्ता से दूर रखा गया था। महिला-पुरुष पत्रकारों के बिच किये गए इस भेदभाव को लेकर विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरा और इसकी जमकर आलोचना की। कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत अन्य कई विपक्षी नेताओं ने अफगानिस्तान के विदेशमंत्री के इस फैसले की कड़ी निंदा की। कांग्रेस नेताओं ने इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए इसे महिलाओं के प्रति भेदभाव बताया था। दूसरी और मोदी सरकार ने सफाई दी कि इस कार्यक्रम में उसकी कोई भूमिका या इंटरफेयर नहीं था। अभी पिछले महीने ही अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने अपने ही देश में इंटरनेट और टेलिकॉम सेवाओं को एक आदेश जारीकर बंद कर दिया था। ऐसा ही एक तालिबानी फरमान जारी हुआ और भारत में अफगान नेता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों की एंट्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 

अफगान नेता की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद इस विवाद के बढ़ने के बाद शनिवार को मोदी सरकार ने स्पष्ट किया कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उसका कोई हस्तक्षेप, इंटरफेयर नहीं था। सरकारी सूत्रों के अनुसार, “विदेश मंत्रालय का दिल्ली में हुई अफगान विदेश मंत्री की प्रेस वार्ता से कोई संबंध नहीं था।” अफगान नेता की इस प्रेस वार्ता में कोई महिला पत्रकार मौजूद नहीं थी, जिसकी तस्वीरें सामने आने के बाद यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया और तालिबान की महिला विरोधी नीतियों को लेकर व्यापक आलोचना हुई।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सवाल उठाया: “प्रधानमंत्री जी, कृपया स्पष्ट करें कि तालिबान प्रतिनिधि की भारत यात्रा के दौरान आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को बाहर क्यों रखा गया? यदि महिलाओं के अधिकारों की बात केवल चुनावी नारा नहीं है, तो भारत में इस तरह का भेदभाव कैसे स्वीकार किया जा सकता है?”

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए और प्रियंका गाँधी के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा:  “जब प्रधानमंत्री महिला पत्रकारों को किसी सार्वजनिक मंच से बाहर रखने की अनुमति देते हैं, तो यह संदेश जाता है कि वे महिलाओं के अधिकारों के लिए खड़े होने में कमजोर हैं। भारत की हर महिला को समान अवसर का अधिकार है, और ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की चुप्पी उनके ‘नारी शक्ति’ वाले नारों की सच्चाई को उजागर करती है।”

वास्तव में अफगानी विदेश मंत्री की इस प्रेस कांफ्रेंस में जब पुरुष पत्रकारों ने देखा होगा कि वहां पर महिला पत्रकारों को प्रतिबंधित किया गया है तो उन्हें वहां से वॉकआउट करना चाहिए था। यह घटना लोकतांत्रिक मूल्यों और पत्रकारिता की गरिमा पर बड़ा आघात है। 

तालिबान की महिला विरोधी छवि पर उठे थे सवाल: पत्रकारों और सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इस घटना को महिला विरोधी रवैया बताया था। कई लोगों ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में तालिबान की सोच को मंच देना महिलाओं का अपमान है। गौरतलब है कि तालिबान, जो वर्तमान में अफगानिस्तान की सत्ता में है, महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए बदनाम है। अफगान महिलाओं को अब भी कई बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया है। अभी पिछले महीने ही अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने अपने ही देश में इंटरनेट और टेलिकॉम सेवाओं को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया था। महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूर रखने की इस पूरी घटना ने न केवल तालिबान की नीतियों पर, बल्कि भारत में आयोजित ऐसे कार्यक्रमों में सरकारी जिम्मेदारी और महिला समानता के प्रश्नों पर भी नई बहस छेड़ दी है। इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए। 

और सबसे बड़ी बात। महिला पत्रकारों की नो एंट्री वाली इस बड़ी खबर पर चाटुकार और गोदी मीडिया ने अपना रोल बखूबी निभाया। उन्होंने इस खबर से पूरी तरह से दुरी बना ली थी। 

खैर जब जागो तब सवेरा। आज दूसरी प्रेस कांफ्रेंस में तालिबानी नेताओं ने महिला पत्रकारों को आमंत्रित भी किया और कांफ्रेंस में सबसे आगे वाली सीटों पर भी बिठाया। 


जय हिन्द। 
नमस्कार, मेरा नाम है पीके वर्मा।

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