राष्ट्रवाद, इंसानियत और भाईचारे की बड़ी मिसाल थे साहेब

- [By: Meerut Desk || 2024-09-21 16:11 IST
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मेरठ। स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी, राष्ट्रवादी, मृदुभाषी और निर्भीक-निष्पक्ष पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ और सिटीजन ऑफ़ द वर्ल्ड न्यूज़ मैगज़ीन के संस्थापक और प्रधान संपादक रहे एडिटर दौलतराम साहेब (21 जून 1925 – 5 दिसंबर 2020) की 99वी जयंती है। वह एक मजबूत और शानदार शख़्सियत के मालिक थे।
सिटीजन ऑफ़ द वर्ल्ड: साहेब ने राष्ट्रिय न्यूज़ मैगज़ीन सिटीजन ऑफ़ द वर्ल्ड न्यूज़ मैगज़ीन की स्थापना दिसंबर 2003 में की थी। इस राष्ट्रीय समाचार पत्रिका का पहला अंक 1 दिसंबर 2003 में हुआ और इसका विमोचन चौ. चरणसिंह यूनिवर्सिटी मेरठ के सभागार में किया गया था। जिसमे सैकड़ों लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। पत्रिका के विमोचन के समय ही शहर और प्रदेश भर से 21 बड़ी शख़्सियत को सिटीजन ऑफ़ द वर्ल्ड ग़ौरव अवॉर्ड 2004 से सम्मानित किया गया था। इस राष्ट्रिय पत्रिका के संपादक के तौर पर साहेब ने कभी समझौता नहीं किया और आखिर तक fearless & favourless jouranlist के तौर पर काम करते रहे।
स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी, निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकार, पूरी जिंदगी अपनी शर्तों एवं उसूलों पर जीने वाले, मजलूमों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले, महान आध्यात्मिक उपदेशक, समाजसेवी, जानवरों, पक्षियों की सालो से सेवा करने वाले, सैकड़ों-हजारों लोगों की मदद करने वाले, यशश्वी, तेजस्वी, सौम्य, सुन्दर, कर्मठ, अहिंसा के अग्रदूत, पर्यावरणविद एवं शिक्षाचिंतक साहेब पत्रकरिता को सर्वोच्च शिखर पर ले गए। उन्होंने हमेशा निर्भीक एवम् निष्पक्ष पत्रकारिता की विचारधारा पर काम किया। अपनी शर्तो पर जीवन जीने वाले दौलतराम साहेब कभी भी किसी से डरे नही, कभी भी झुके नहीं। सिद्धांतों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अपने भरे-पूरे परिवार एवं कुटुंब में उनकी पहचान अलग ही रही। एकदम बेबाक एवं सत्यप्रेमी। 70 के दशक में वह अपनी पत्रकारिता से बड़े-बड़े धन्नासेठ एवं दुरन्धरों की पेशानी पर पसीना ला देते थे। लालच एवं धमकी उन्हें रत्ती भर भी डिगा नहीं पाई।
‘प्रेमवतीदेवी दौलतराम एजुकेशनल वेलफेयर सोसाइटी’ के चेयरमैन के रूप में भी कार्य करते हुए साहेब निर्धन छात्र-छात्राओं, बेसहारा लोगों एवं जरूरतमंदों की सहायता के लिए सदैव तैयार रहते थे। उन्होंने हजारों जरूरतमंदों की अपनी जेब से मदद की। बिना सरकारी-गैरसरकारी सहायता लिए वह लोगों सहायता करते रहे। अनगिनत गरीब लड़कियों की शादी करवाने में उन्होंने मदद की।
आजादी की लड़ाई में भी युवा साहेब ने बढ़चढ़ हिस्सा लिया। उन्होंने एक अध्यापक से पढ़ने से इसलिए इंकार करते हुए स्कूल छोड़ दिया क्योंकि वह अध्यापक एक अंग्रेज मिशिनरी था। उसके बाद उन्होंने बिना स्कूल गए ही अपनी पढ़ाई जारी रखी। महात्मा गाँधी से प्रभावित साहेब आजादी की लड़ाई में कूद गए एवं आंदोलनों के दौरान कई बार लाठियां खाई। लेकिन वह डरे नहीं कभी झुके नहीं।
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