कांशीराम को लेकर अखिलेश यादव पर क्यों भड़की मायावती

- [By: Pramod DaulatRam || 2025-10-08 02:04 IST
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बहुजन समाज पार्टी को फिर से जिन्दा करने के लिए पार्टी की राष्ट्रिय अध्यक्ष मायावती नौ अक्तूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ में बड़ी महारैली करने जा रही हैं। यह महारैली करीब पांच साल बाद हो रही है। इसी बीच अखिलेश यादव ने भी उसी दिन कांशीराम पर एक संगोष्ठी के आयोजन की घोषणा की है। बस बात यही से शुरू हो गई। अखिलेश यादव की इस घोषणा से मायावती बुरी तरह से भड़क गई हैं।
मायावती ने कहा कि बसपा संस्थापक कांशीराम के प्रति विरोधी पार्टियों खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का रवैया हमेशा से घोर जातिवादी और द्वेषपूर्ण रहा है। मायावती ने 9 अक्टूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर एक संगोष्ठी आयोजित करने की अखिलेश यादव के ऐलान का जिक्र करते हुए इसे ''घोर छलावा'' कहा। मायावती ने कहा की यह मुंह में राम बगल में छुरी की कहावत को चरितार्थ करने वाला लगता है।
— Mayawati (@Mayawati) October 7, 2025
दरअसल मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट लिखी। उस पोस्ट के जरिए मायावती ने आरोप लगाया कि समाजवादी नेता न केवल बसपा संस्थापक कांशीराम के जीते-जी उनके पार्टी के साथ दगा करके उनके आंदोलन को उत्तर प्रदेश में कमजोर करने की लगातार कोशिशें कीं, बल्कि बसपा सरकार द्वारा 17 अप्रैल सन् 2008 को अलीगढ़ मण्डल के कासगंज को जिला मुख्यालय का दर्जा देकर कांशीराम नगर के नाम से बनाये गये नये
जिले के नाम को भी जातिवादी सोच व राजनीतिक द्वेष के चलते बदल दिया।
जैसा की आप जानते ही है कि बहुजन समाज पार्टी का आधार वोट बैंक दलित ही रहा है। यूपी का दलित कांशीराम के नाम पर ही एकजुट हुआ और मायावती ने 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। अब स्थिति यह है कि विधानसभा में बसपा का केवल एक विधायक है। लोकसभा में तो बसपा का प्रतिनिधित्व करने वाला एक भी सांसद नहीं है। यही स्थिति 2014 के आम लोकसभा चुनाव की थी जब बसपा जीरो पर आउट हो गई थी। लेकिन 2019 में बहुजन समाज पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन कर लिया जिसके चलते बसपा को 10 लोकसभा सीट हासिल हो गई। लेकिन इसके थोड़े ही दिन बाद बसपा-सपा का गठबंधन मायावती ने तोड़ दिया। अब 2027 में मायावती को उत्तर प्रदेश में होने वाले आम विधानसभा चुनाव में बड़ी उम्मीदें है कि कुछ ऐसा चमत्कार हो जाये जिससे बसपा फिर से सत्ता में आ जाये बस। मायावती को लगता है कि भले ही वर्तमान में विधानसभा और लोकसभा में सीटें नहीं हैं लेकिन दलित वोटर अब भी उनके साथ हैं। इसी दलित वोट बैंक को साधने के लिए मायावती 9 अक्टूबर को एक महारैली करने जा रही है।
लेकिन जब से समाजवादी पार्टी ने कांशीराम के नाम पर एक संगोष्ठी करके दलित वोटरों का रुझान अपनी तरफ करने की आशंका से मायावती घबरा गई है। अपनी पोस्ट में मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि बसपा सरकार के दौरान कांशीराम के सम्मान में उनके नाम से जो विश्वविद्यालय, कॉलेज, अस्पताल आदि बनाये गये थे उनमें से भी अधिकतर का नाम सपा सरकार के समय बदल दिया गया। मायावती ने सवाल किया कि यह सपा की घोर दलित विरोधी चाल, चरित्र व चेहरा नहीं तो और क्या है? लेकिन अब हमारा सवाल है कि यदि ऐसा ही है तो मायावती ने 2019 में सपा से क्यों गठबंधन किया, जिसमे 2014 में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिलने पर 2019 में 10 सीटे इसी गठबंधन के चलते अपनी झोली में डाल ली थी
मायावती ने कहा कि इतना ही नहीं कांशीराम के निधन पर पूरा देश व खासकर उत्तर प्रदेश शोकाकुल था, फिर भी सपा सरकार ने उत्तर प्रदेश में एक दिन का भी राजकीय शोक घोषित नहीं किया। इसी प्रकार कांग्रेस पार्टी की तब केन्द्र में रही सरकार ने भी उनके निधन पर एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया। लेकिन कांशीराम के जन्मदिन अथवा पुन्यतिथि पर तो भाजपा सरकार ने कोई अवकाश घोषित नहीं किया। आलोचना ही करनी है तो तमाम दलों की करनी चाहिए।
मायावती ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर हमला करते हुए कहा कि देश में जातिवादी व्यवस्था के शिकार करोड़ों दलित, आदिवासी व अन्य पिछड़े बहुजनों को शोषित से शासक वर्ग बनाने के डा. भीमराव अम्बेडकर के मिशनरी आत्म-सम्मान व स्वाभिमान मूवमेन्ट के कारवाँ को ज़िन्दा करके उसे नई गति प्रदान करने वाले बहुजन समाज पार्टी के जन्मदाता एवं संस्थापक कांशीराम के प्रति विरोधी पार्टियों में भी ख़ासकर समाजवादी पार्टी व कांग्रेस आदि इन पार्टियों का रवैया हमेशा से घोर जातिवादी एवं द्वेषपूर्ण रहा है, जो कि सर्वविदित है। इसीलिये आगामी 9 अक्टूबर को उनके परिनिर्वाण दिवस पर संगोष्ठी आदि करने का सपा प्रमुख अखिलेश यादव की घोषणा घोर छलावा व लोगों को स्पष्टतः इनके मुँह में राम बग़ल में छुरी की कहावत को चरितार्थ करने वाला ज्यादा लगता है।
इसी का नाम सियासत है यानी राजनीति।
अब देखना है कि मायावती की 9 अक्टूबर को होने वाली महारैली में क्या होता है। क्या वादे होते है और कौन-कौन विपक्षी नेता बसपा में शामिल होते है।
नमस्कार। मेरा नाम है पीके वर्मा
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