महान भारत की बात: उर्दू खात्मे की और क्यों है?

- [By: Pramod DaulatRam || 2025-10-19 02:00 IST
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महान भारत की बात कार्यक्रम में आज बात करेंगे उर्दू खात्मे की और क्यों है।
उर्दू खात्मे की और क्यों है, इस पर गुफ्तगू यानी चर्चा करने से पहले गुलज़ार साहब को सुनते है:
ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का
मज़ा घुलता है लफ़्ज़ों का ज़बाँ पर
कि जैसे पान में महँगा क़िमाम घुलता है।
कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दू
तो लगता है कि दिन जाड़ों के हैं खिड़की खुली है,
धूप अंदर आ रही है।
आइये अब आते है मैन मुद्दे पर। दरअसल उर्दू खात्मे की और इसलिए है क्योंकि इसे एक धर्म से जोड़ दिया गया है। यानि अगर कोई उर्दू बोलता या लिखता है तो वह मुसलमान है और जो भी मुसलमान है उसकी जबान सिर्फ उर्दू है। ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होता है कि उर्दू जबान मुसलमानों की और हिंदी जबान हिन्दुओ की बात ख़त्म। बात खतम नहीं बात तो यहीं से शुरू होती। उर्दू सिर्फ हिंदुस्तान की जबान है जो दुनिया में सबसे अधिक हिंदुस्तान में ही बोली जाती है।
अगर धर्म की ही बात है तो फिर अरब, अफ्रीका, चाइना और भारत देश की बात करें तो दक्षिण भारत, कश्मीर, पश्चिमी बंगाल के मुसलमानों की जबान तो उर्दू नहीं है फिर उर्दू को सिर्फ मुसलमानों की जबान क्यों कहा जा रहा है। संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ गुलज़ार देश के सबसे बड़े उर्दू लेखक और शायर है। वह उर्दू लिखते है और उर्दू बोलते है और उर्दू ही ओढ़ते है। उर्दू ही जीते है।
दरअसल उर्दू भारत के कुछ फीसदी मुसलमानों ही पढ़ सकते है। आज मुसलमानों के बच्चे क्रिश्चियन स्कूलों में पढ़ते है। वे उर्दू लिखना तो दूर बोल भी नहीं पाते है।
अच्छा आप ही बताओ क्या इंग्लिश सिर्फ अंग्रेजों की जुबान है। दुनिया के हर देश की ज़ुबान अलग है लेकिन इंग्लिश सभी देशों में बोली जाती है। क्या पंजाबी सिर्फ सीखो की जबान है नहीं। भारत के पंजाब दिल्ली में और कनाडा और पाकिस्तान में पंजाबी बड़ी तादाद में बोली जाती है।
1971 में पाकिस्तान की जनसंख्या लगभग 6 करोड़ थी और पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश की जनसंख्या 1971 में 7 करोड़ से ज्यादा थी। लेकिन 7 करोड़ बंगाली मुसलमानों से कहां कि हम उर्दू नहीं बोलेंगे क्योंकि हमारी मादरे जबान तो बंगाली है। और बंगलादेश के 7 करोड़ बंगाली बोलने वाले मुसलमानों ने पाकिस्तान के 6 करोड़ उर्दू और पंजाबी बोलने वाले मुसलमानों से खुद को अलग करने के लिए विद्रोह कर दिया। इसलिए यह कहना गलत होगा कि उर्दू सिर्फ मुसलमानों की जबान है या मुसलमानों की जबान सिर्फ उर्दू है।
दरअसल हिंदुस्तान में जुबानों यानी भाषा में मतभेद तब से शुरू हुआ था जब से अंग्रेजों ने हिंदू मुसलमानों को आपस में लाडवा कर कमजोर करने के लिए डिवाइड एंड रूल की पॉलिसी को ब्रिटिश भारत में लागू किया था। अंग्रेजों ने 1857 के गदर को कमजोर करने के लिया, खत्म करने के लिए कहा कि हिंदी हिन्दुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की जबान है।
मेरठ में मेट्रो प्लाजा के सामने एक दाल वालो की मशहूर दुकान है। एक बार में वहां से दाल रोटी लेने गया तो वहां पर बैठे बुजुर्ग ने दाल रोटी का पर्चा उर्दू में लिखा जबकि वह हिंदू थे। मैने जब उनसे पुछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने बचपन से ही स्कूल में उर्दू सीखी और पढ़ी है। इसे आप क्या कहेंगे। सहारनपुर में मेरे एक रिश्तेदार है जिन्होंने उर्दू भाषा में बीए की डिग्री ली है।
जहां तक मेरा ताल्लुक है, कौन भी भाषा या जबान को खत्म नहीं किया जा सकता। भाषा अपने आप में बहुत महान होती है। अभी दो दिन पहले तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 2026 में विधानसभा चुनाव में तमिल लोगों को खुश करने के लिए हिंदी के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगाने वाला विधेयक लाने की बात कही थी, लेकिन ऐसा हो न सका, यह अलग बात है। राज ठाकरे ने भी भाषा के नाम पर गैर मराठी लोगों पर बहुत जुल्म किया, उनके साथ हिंसा की। लेकिन भाषा के नाम पर वह सालों से सत्ता में नहीं आ सके। अभी पिछले महीने ही भारत में मेनस्ट्रीम मीडिया के न्यूज़ चैनल और अख़बारों से उर्दू लब्जो का इस्तेमाल नहीं करने का एक फरमान जारी हुआ था। लेकिन जनाब उर्दू के बिना हिंदुस्तानी जबान अधूरी है। यह बात आपको माननी पड़ेगी।
लेकिन फिर भी भारत में उर्दू के खात्मे की ओर बढ़ता खतरा। इसके तीन अहम् वजह है:
1. भारत में उर्दू कभी मोहब्बत, तहज़ीब और इल्म की जुबान मानी जाती थी। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि यह भाषा धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है। इसके पीछे कई सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक कारण हैं। सबसे पहले, शिक्षा व्यवस्था में उर्दू की जगह सिकुड़ती जा रही है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में उर्दू माध्यम के संस्थान या तो बंद हो गए हैं या नाम मात्र के रह गए हैं। नई पीढ़ी अंग्रेज़ी और हिंदी की ओर झुक रही है, जिससे उर्दू पढ़ने और लिखने वालों की संख्या घट रही है।
2. दूसरा, उर्दू को धर्म विशेष से जोड़कर देखा जाने लगा है। यह धारणा कि उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की भाषा है, इस भाषा के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनी। जबकि हकीकत यह है कि उर्दू भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति की उपज है और इसकी जड़ें हर समुदाय में फैली हैं।
3. तीसरा कारण मीडिया और तकनीक का है। टेलीविज़न, अख़बार और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर उर्दू का इस्तेमाल बहुत कम होता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी हिंदी या अंग्रेज़ी का बोलबाला है।
इसके बावजूद उर्दू का साहित्य, शायरी और नज़्में आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं। लेकिन अगर इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना है तो ज़रूरी है कि सरकार, समाज और शिक्षण संस्थान मिलकर उर्दू को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाएं — जैसे उर्दू शिक्षा को प्रोत्साहित करना, उर्दू अख़बारों और डिजिटल कंटेंट को बढ़ावा देना, और इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सम्मान देना। उर्दू का खात्मा सिर्फ़ एक भाषा का खोना नहीं होगा, बल्कि भारत की साझा संस्कृति की एक खूबसूरत रूह का मुरझाना होगा।
दरअसल भाषा एक माध्यम होती है एक दूसरे को जोड़ने की। यहां पर हम बात कर रहे थे उर्दू की। तो मेरे लिहाज से उर्दू वास्तव में एक रूहानी और खूबसूरत जबान है जो रस और तहजीब में लिपटकर दिल से निकलती है और दिलो पर असर करती है।
नमस्कार मेरा नाम है पीके वर्मा
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