2029 तक केवल ये तीन गोदी न्यूज़ चैनल बचेंगे

- [By: Pramod DaulatRam || 2026-01-04 23:37 IST
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2029 तक केवल ये 3 गोदी न्यूज़ चैनल बचेंगे, बाकि न्यूज़ चैनलों में से कुछ सरेंडर करेंगे तो कुछ बगावत भी कर सकते है
अभी पिछले दिनों रिपब्लिक भारत के संपादक अर्णब गोस्वामी का अपने रिपब्लिक भारत अंग्रेजी चैनल पर अजीब तरह का वीडियो सामने आया। पहले तो लगा यह विडिओ एआई से बनाया गया है। लेकिन ऐसा नहीं था। यह वीडियो वास्तिवक था। दरअसल इस वीडियो में गोदी एंकर अर्नब गोस्वामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर अपनी कुख्यात चीखने चिल्लाने वाले स्टाइल में दूसरे चाटुकार पत्रकार यानि मिस्टर सुधीर तिहाड़ी चौधरी का नाम लेकर लगभग चीखते हुए कह रहा था कि 15 करोड़ रूपये की सैलरी लेने वाला एंकर कहा है वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल क्यों नहीं पूछता। वास्तव में इस वीडियो को देखकर लाखों करोडो लोग चौक पड़े कि चाटुकारिता की पत्रकारिता का महारथी अर्नब गोस्वामी ये किस तरह की बहकी-बहकी बातें कर रहा है। कही आज इसने चढ़ा नहीं ली। क्या उसे मोदी सरकार से डर नहीं लगा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चिल्लाकर, उनपर आरोप लगाकर। दरअसल अर्नब गोस्वामी के इस तरह से अचानक पाला बदलने या ईमान बदलने की कहानी कुछ और ही है। यह सारा मामला सरकारी विज्ञापनों का है। यह सब विज्ञापनों से मिलने वाले करोडो रूपये के रेवेन्यू का मामला है। असली हड़बड़ाहट और खिसियाहट सरकारी विज्ञापनों की ही है।
2024 में जब से प्रधानमंत्री नरेंद मोदी चंद्रबाबू नायडू और नितीश कुमार की पार्टी की बैसाखी पर सवार होकर तीसरी बार सरकार बनाये है तभी से भारतीय मीडिया के भीतर जो हलचल चल रही है, वह अब छिपी नहीं रह गई है। इन मीडिया हाउसेस में लगभग तमाम चैनल या अख़बार गोदी मीडिया की केटेगरी में आते है। अब इन गोदी मीडिया के आर्थिक हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कमाई और प्रभाव के मामले में असल ताकत कुछ गिने-चुने मीडिया घरानों तक सिमटती दिख रही है। चर्चा है कि आज अगर किसी की मीडिया से होने वाली कमाई अपेक्षाकृत सुरक्षित है यानी उसकी दूसरों मीडिया हाउसेस के मुकाबले अधिक कमाई हो रही है तो वह अदाणी समूह के एनडीटीवी और अंबानी समूह के न्यूज़18 तक ही सीमित है। जबकि बाकी तमाम बड़े और खुद को नंबर वन या नंबर टू बताने वाले चैनल भी आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं। उन्हें सरकारी फंडिंग यानी सरकारी विज्ञापन बहुत कम मिल रहे है। यानि उनका रेवेन्यू डाउन फॉल की और जा रहा है। इतना ही नहीं देश का सबसे पुराना चैनल आजतक भी इस विज्ञापन संकट से अछूता नहीं है। खुद आज तक के अरुण पुरी मीडिया इंडस्ट्री की बदहाली और सरकारी विज्ञापनों के संकट पर खुलकर बोल चुके हैं। इसका मतलब साफ है कि यह समस्या छोटे चैनलों की ही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है।
एक बात और, पिछले कुछ वर्षों में कॉरपोरेट विज्ञापन और सरकारी विज्ञापन का संतुलन भी बदला है। कुछ मीडिया हाउसेस का आरोप है कि सरकारी विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा मीडिया संस्थानों तक सीमित कर दिया गया है, इनमे अडानी का एनडीटीवी और अम्बानी का न्यूज़ 18 है। जिसके चलते बाकी मीडिया आर्थिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। इसका असर उन चेहरों पर भी दिख रहा है जो कभी सत्ता के सबसे मुखर समर्थक माने जाते थे, और सत्ता पक्ष की खुलकर सीना ठोककर चापलूसी करते थे। यानी ये चेहरे सत्ता पक्ष के झूठ को सच और विपक्ष के सच को झूठा साबित करने में महारथ हासिल थे। जिसके चलते देश जनता ऐसे चेहरों को गोदी मीडिया कहता रहा है। जिनमें अर्नब गोस्वामी जैसे नाम भी शामिल हैं, जिसमे काम विज्ञापन मिलने पर सत्ता से ही सवाल पूछना शुरू कर दिया। पिछले दिनों अर्नब गोस्वामी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने का जो वीडियो क्लिप देखि गई वह अर्नब गोस्वामी के अंग्रेजी चैनल के रेवेन्यू हो रही बड़ी गिरावट का ही नतीजा है। इस वीडियो में अर्नब गोस्वामी की खिसियाहट और झल्लाहट साफ देखि जा सकती है।
दरअसल जब से 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी इस बार जिस तरह बहुमत से दूर रहे और उन्हें चंद्रबाबू नायडू और नितीश कुमार की मेहरबानी से अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी बचानी पड़ी लगभग तभी से मीडिया गलियारों में यह सवाल अब आम है कि क्या नरेंद्र मोदी 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले केवल दो बड़े कॉरपोरेट मीडिया हाउस यानी अदाणी समूह का एनडीटीवी और अंबानी समूह का न्यूज़18 पर भरोसा करना ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं। यानि बीस-तीस मीडिया संस्थानों को मैनेज करने से बेहतर क्या सत्ता के लिए सिर्फ दो न्यूज़ चैनलों को साधे रखना आसान नहीं है। वैसे आजतक भी फ़िलहाल दौड़ में है क्योकि यह भी देश का एक पुराना न्यूज़ चैनल है। इसके अलावा आने वाले समय में सिर्फ न्यूज़18 और एनडीटीवी ही बने रहेंगे। बाकियों चैनलों की सरकारी फंडिंग यानी सरकारी विज्ञापन के रूप में मिलने वाली आर्थिक सप्लाई बंद कर दी जाएगी जिससे इन न्यूज़ चैनलों की दुकान खुद बा खुद ही बंद हो जाएगी।
भारत के मीडिया की दुनिया में चर्चा है कि इस साल 2026 में गोदी मीडिया की सूरत और सीरत बदलती दिख सकती है। कुछ गोदी मीडिया वाले लोग बगावत भी कर सकते है और इसके साथ ही कुछ गोदी चैनल पूरी तरह से सरेंडर कर देंगे। यानि विज्ञापन मिला तो ठीक न मिला तो भी क्या बिगाड़ लेंगे। इसके अलावा कुछ गोदी पत्रकार यूट्यूब व डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी ट्रांसफर हो सकते है। लेकिन असली सच यही है कि रोटी का सवाल अब भी सत्ता से जुड़ा रहेगा और यह प्राथमिकता पर ही रहेगा। लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि अर्नब गोस्वामी की तरह बगावती तेवर दिखाने वाले पत्रकारों के साथ क्या होगा। क्या बगावती पत्रकारों को भी सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स का सामना करना पड़ेगा जैसा की विपक्ष के नेताओं को डराने, धमकाने और दबाने लिए किया जाता रहा है।
फ़िलहाल भारतीय मीडिया का जो सिनेरियो दिख रहा है उससे तो यही लगता है कि यह पूरी लड़ाई विज्ञापन के साथ ही कंट्रोल की भी है। और कयास तो यही लगाए जा रहे है कि भारतीय मीडिया के इस सरकारी विज्ञापनों के खेल में अदाणी ग्रुप ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। दूसरी और अंबानी ग्रुप मोदी सरकार का कितनी दूर तक साथ देगा और किस मोड़ पर क्या रुख अख्तियार किया जायेगा यह तो सिर्फ एक ही चीज डिसाइड करेगी और वह है वक्त।
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