1971 में अमेरिका के सामने बिना झुके पाकिस्तान का सरेंडर करा देने वाली इंदिरा गाँधी 

  • [By: Pramod DaulatRam || 2026-03-20 21:27 IST
  • 57
1971 में अमेरिका के सामने बिना झुके पाकिस्तान का सरेंडर करा देने वाली इंदिरा गाँधी 

बांग्लादेश का मुक्ति आंदोलन: बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन एक राष्ट्रवादी अभियान था जिसका उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से आज़ादी दिलाना था। जब 1947 में पाकिस्तान आज़ाद हुआ, तो इन दोनों पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक, भौगोलिक, राजनीतिक और भाषाई मुद्दों पर विरोधाभाष था। इन विरोधाभाषों को दूर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। पश्चिमी पाकिस्तान के लोग खुद को पूर्वी पाकिस्तान के लोगों से बेहतर और ऊपर मानते थे। 

पूर्वी पाकिस्तान में विरोध और तनाव तब और अधिक बढ़ गया जब पश्चिमी पाकिस्तान की सरकार ने एक ही पहचान थोपने की कोशिश की। मोहम्मद अली जिन्ना रेडियो पाकिस्तान से घोषणा करके उर्दू को पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया। इस तरह से पूर्वी पाकिस्तान  बंगाली बोलने और समझने वाले लोगों जबरन उर्दू थोपने की कोशिश गई। 

जबरन उर्दू ज़बान थोपने के चलते पूरे पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर बगावत शुरू हो गई। और यह बांग्लादेश के ऐतिहासिक भाषा आंदोलन (1947–71) के रूप में सामने आया। उर्दू ज़बान की मुख़ालफ़त करने वाला यह आंदोलन 1952 में अपने चरम पर पहुँच गया, जब पुलिस ने कई प्रदर्शनकारी छात्रों की गोली मार कर हत्या कर दी। इस ग़दर के अन्य कारण पहनावे से भी जुड़े थे। दरअसल पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली महिलाएँ पारंपरिक रूप से साड़ी पहनती थीं। जबकि पशिचमी पाकिस्तान के अधिकारी साड़ी को हिंदू पहनावा मानते थे और इसके इस्तेमाल का विरोध करते थे। पहनावे के इस मतभेद से भी पूर्वी पाकिस्तान की अवाम और भी ज़्यादा अलग-थलग पड़ गई।

इसके बाद दिसंबर 1970 में हुए पश्चमी और पूर्वी पाकिस्तान में आम चुनाव हुए। जब रिजल्ट डिक्लेअर हुआ तो इन आम चुनावों में, पूर्वी पाकिस्तान के लोकप्रिय राष्ट्रवादी नेता मुजीबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग पार्टी को बहुमत मिला। लेकिन पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान ने मुजीबुर रहमान को नई सरकार बनाने और पाकिस्तान का अगला प्रधानमंत्री बनने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। दरअसल पश्चमी पाकिस्तान  सियासी लोगो को यह बिलकुल गंवारा नहीं था कि कोई बंगाली बोलने वाला लीडर पाकिस्तान का वजीरे आज़म बने। लिहाज़ा पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इस बगावत ने पूर्वी पाकिस्तान को एक अलग मुल्क बनाने की मांग चिंगारी तरह से भड़क उठी। 

जब बगावत अपने चरम पर पहुंची तो मार्च 1971 में, हमेशा शराब शबाब में मस्त रहने वाले राष्ट्रपति याह्या खान ने सेना को बगावत को कुचलने का आदेश दिया। आदेश मिलते ही पाकिस्तानी सेना ने 'ऑपरेशन सर्चलाइट' चलाकर जानवरों तरह बंगालियों  कत्लेआम शुरू कर दिया। कई लाख बंगालियों को मौत के घाट उतार दिया गया। नौ महीने तक यह कत्लेआम चला। पाकिस्तानी सेना ने लाखों बंगाली मर्दों क़त्ल कर दिया और कई लाख बंगाली औरतों का बलात्कार किया। एक अनुमानों के अनुसार, इस कत्लेआम में मरने वालों की संख्या 3 लाख से 30 लाख के बीच थी।

इसी बग़ावत और क़त्लेआम के दरमियान पूर्वी पाकिस्तान में एक संगठित प्रतिरोध आंदोलन उभरकर सामने आया। जल्दी ही यह प्रतिरोध आंदोलन एक गुरिल्ला सेना में तब्दील हो गया, जिसे 'मुक्ति वाहिनी' और "मुक्ति सेना" कहा गया। इस गुरिल्ला सेना ने भारतीय सेना के सहयोग से पाकिस्तानी सैनिकों पर हमले किए। उस समय इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं। इंदिरा गाँधी ने एक आज़ाद बांग्लादेश का समर्थन किया और पूर्वी पाकिस्तान के विद्रोहियों को फ़ौजी मदद दी। पूर्वी पाकिस्तान में भारत का दख़ल रणनीतिक विचारों से प्रेरित था, हालाँकि इंदिरा गांधी ने दावा किया था कि इसका मुख्य उद्देश्य मानवीय चिंता थी। इंदिरा गाँधी ने ब्रिटिश लेखक डोम मोरेस को उनकी किताब 'मिसेज़ गांधी' (1980) में बताया कि भारत ने पाकिस्तान साथ युद्ध में "पूरी तरह से मानवीय कारणों से" भाग लिया क्योंकि भारत खामोश खड़े होकर पूरी आबादी को खत्म होते हुए नहीं देख सकता था।

हिंदुस्तान-पाकिस्तान जंग: पाकिस्तानी सेना के जुल्मोसितम से डरकर पूर्वी पाकिस्तान से एक करोड़ अधिक शरणार्थी सीमा पार करके हिंदुस्तान में घुस गए, जिसे कई भारतीय नेताओं ने भारत के लिए एक बढ़ता हुआ सुरक्षा खतरा माना। पूर्वी पाकिस्तान लोगों साथ साथ खड़ा होकर भारत का उद्देश्य लाखों शरणार्थी लोगों के इस प्रवाह को रोकना था। इस प्रकार इस क्षेत्र में सियासी संकट ने भारत को अपनी क्षेत्रीय प्रभुता स्थापित करने का एक अवसर भी प्रदान किया। 

13 दिसंबर 1971 की अमेरिकी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक ऐसी जीत का पूरा भरोसा था जो भारत को "दक्षिण एशिया में एक प्रमुख शक्ति" के रूप में स्थापित कर देगी। उनका यह भी मानना ​​था कि इस युद्ध से पाकिस्तान की सैन्य सरकार का पतन होगा और बांग्लादेश में एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का होगा।