1971 के भारत-पाक जंग दौरान इंदिरा गाँधी अमेरिका की धमकी से डरी नहीं, और उसे करारा जवाब दिया  

  • [By: Pramod DaulatRam || 2026-03-21 00:15 IST
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1971 के भारत-पाक जंग दौरान इंदिरा गाँधी अमेरिका की धमकी से डरी नहीं, और उसे करारा जवाब दिया  

भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की दृढ शक्ति के चलते भारतीय सेना ने 13 दिन में ही पाकिस्तान को घुटने पर ला दिया था। अमेरिका ने खूब कोशिश की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को धमकाने की, उन्हें दवाब में लेने की। लेकिन इंदिरा गाँधी के सामने अमेरिका की एक नहीं चली। और उस अमेरिका के सामने जिसने इस युद्ध में पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया, भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तान से दुनिया का सबसे बड़ा सर्रेंडर करवाया। लगभग एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय फ़ौज के सामने हथियार डाल दिए। और अमेरिका देखता रह गया। पाकिस्तान को अमेरिकी और अन्य कई देशों की सपोर्ट के बावजूद इंदिरा गाँधी निर्देश पर भारतीय फ़ौज ने 13 दिन में ही पाकिस्तान को उसकी औकात दिखाते हुए उससे पूर्वी पाकिस्तान छीनकर बांग्लादेश की स्थापना की। 

दरअसल 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध केवल 13 दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत निर्णायक युद्ध था। पाकिस्तान के हारते ही दक्षिण एशिया का नक्शा बदल गया और बांग्लादेश नाम के एक नए देश का जन्म हुआ। यह युद्ध 3 दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 के बीच लड़ा गया था।

पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना द्वारा बंगाली आबादी पर भीषण अत्याचार किए जा रहे थे। पाकिस्तानी सेना ने इसे ऑपरेशन सर्चलाइट का नाम दिया था। पाकिस्तानी सेना ने जल की इंतहा पार करते हुए कई लाख बंगालियों का क़त्ल कर दिया और 2-3 लाख बंगाली महिलाओं का बलात्कार किया। इससे बचने के लिए लगभग एक करोड़ बंगाली शरणार्थी भारत आ रहे थे, जिससे भारत पर आर्थिक और सामाजिक बोझ पड़ रहा था।

पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारतीय वायुसेना के 11 स्टेशनों पर पूर्व-नियोजित हवाई हमले किए, जिसे 'ऑपरेशन चंगेज खान' कहा गया। इसके जवाब में भारत ने युद्ध की घोषणा कर दी। भारतीय सेना ने पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर हमला किया। पूर्वी मोर्चे पर, भारतीय सेना ने 'ब्लिट्जक्रीग' (Blitzkrieg) तकनीक अपनाकर तेजी से ढाका की घेराबंदी की।

इस जंग में पाकिस्तानी सेना की बड़ी दुर्गति हुई। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को भगा-भगा कर मारा। पाकिस्तानी सेना का अपनी ताकतवर सेना होने का नशा जल्द उतर गया। नतीजा 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना के पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी ने 93,000 से अधिक सैनिकों के साथ भारतीय सेना के जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था। इस सरेंडर के बाद एक नए स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ। 

1971 युद्ध में अमेरिका की भूमिका: भारत-पाकिस्तान के इस युद्ध में अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया और भारत के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया। अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार और गोला बारूद उपलब्ध कराया। इतना ही नहीं पाकिस्तान की मदद के लिए और भारत को डराने के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा। इसमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाला विमानवाहक पोत 'यूएसएस एंटरप्राइज' (USS Enterprise) शामिल था। ऐसा करके अमेरिका चाहता था कि पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना आगे न बढ़े। पाकिस्तान के समर्थन में अमेरिका के इस कदम के जवाब में, भारत के सहयोगी सोवियत संघ (USSR) ने अपना परमाणु-सशस्त्र बेड़ा भेजा, जिसने अमेरिकी सातवें बेड़े के आगे-पीछे रहकर उसे बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करने से रोक दिया। 

राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत को चेतावनी दी कि वह पाकिस्तान के मामले में दखल न दे। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अमेरिकी धमकी पर ध्यान नहीं दिया और दो टूक जवाब दिया कि भारत किसी के भी सामने झुकेगा नहीं, डरेगा नहीं। 

जब इंदिरा गाँधी अमेरिका की धमकी के दवाब में नहीं आई तो अमेरिका के मक्कार राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत के खिलाफ चीन को फुसलाया। हालिया खुलासों से पता चला है कि राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन से भारत के खिलाफ पाकिस्तान की सैन्य मदद करने और भारत पर हमला करने के लिए कहा था, जिसका उद्देश्य सोवियत संघ के प्रभाव को कम करना था। लेकिन चीन ने भारत खिलाफ जाने से इंकार कर दिया। 

इसके बाद अमेरिका दूसरी चाल चली। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम का प्रस्ताव रखा ताकि पाकिस्तान को हार से बचाया जा सके। लेकिन भारत ने अमेरिका की इस चाल को भी नाकाम कर दिया। 

पाकिस्तान, अमेरिका  कई देशों तमाम षड्यंत्र के बावजूद प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की मजबूत इच्छाशक्ति और भारतीय सेना के दृढ़ संकल्प के आगे अमेरिका की तमाम धमकियां काम नहीं आईं। और 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की करारी हार के बाद आत्मसमर्पण के बाद अमेरिकी बेड़े को वापस लौटना पड़ा। और दुनिया में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का रूतबा और बुलंद हो गया।