दलितों पर अत्याचार पर एक भी शब्द नहीं बोली दलित नेता मायावती

  • [By: Pramod DaulatRam || 2025-10-11 23:22 IST
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मायावती की यह रैली दलितों के साथ धोखा साबित हुई। दलित नेता मायावती की यह कैसी रैली, दलित अत्याचार पर एक शब्द नहीं बोला। आज बात करेंगे मायावती के डर और लाचारी से भरे भाषण की। 

लगभग 9 सालों बाद मायावती ने कोई बड़ी रैली की। दलित नेता मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद के साथ मंच पर आई। मायावती ने जहाँ समाजवादी पार्टी को दोगला बताया वही यूपी की योगी सरकार का आभार जताया। आप भी सुनिय मायावती ने अपने आज के भाषण में क्या कहा:

लेकिन मायावती के भाषण ने पार्टी के नेताओं, करकताओं ही नहीं तमाम विपक्ष को निराश किया। दलितों की नेता मायावती ने दलितों पर हो रहे अत्याचार पर एक शब्द नहीं बोली। मायावती ने सिर्फ उन नेताओ और पार्टियों को कोसा जो सालों से सत्ता से बाहर है। जो सत्ता में बैठे है उनसे एक भी सवाल मायावती ने कभी नहीं पूछा। मायावती ने 2014 से केंद्र की मोदी सरकार और 2017 से प्रदेश में योगी सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। आखिर जेल जाने का डर क्या क्या करा देता है। यह कई सालों से देश की जनता देख रही है।

किसी भी देश में राजनीती के दो पक्ष होते है: सत्ता पक्ष और विपक्ष। जहाँ सत्ता पक्ष अपने हिसाब से शासन करता है वहीँ विपक्ष सत्ता पक्ष से सवाल करता है। लेकिन भारत की राजनीती में ऐसा नहीं होता। मायावती एक ऐसी नेता है जो सत्तासीन सरकार से सवाल पूछने या उसकी आलोचना करने से डरती है। और मायावती सवाल उस पार्टी से पूछती है जो सालों से सत्ता से बाहर है। प्रदेश में पिछले कई सालों से चाहे दलितों पर जुल्म हो रहा हो। रोजगार ख़त्म हो गए हो। महंगाई से लोग भूखे मर रहे हो। कोरोना में लाखों लोग प्रभावित हुए लेकिन मायावती के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। ऐसा नेता कभी नेता नहीं हो सकता। ऐसा नेता सिर्फ सत्ता में आने के लिए लोगों से वोट लेने के बारे में ही सोचता है। नतीजा 2014 में जीरो। 2019 में अखिलेश यादव की अनुकंपा से 10 सीटें। 2024 में फिर जीरो। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक सीट। यानि दलित समझ चुका है कि बहुजन समाज पार्टी और मायावती दलित नेता नहीं है। दलित तो उनका वोट बैंक है। लेकिन दलित वर्ग ने समझ लिया है कि कहाँ वोट करनी है।

अखिलेश यादव ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा:
क्योंकि ‘उनकी’ अंदरूनी साँठगाँठ है जारी
इसीलिए वो हैं ज़ुल्मकरनेवालों के आभारी। 

कभी दलित नेता मायावती कहती थी कि “हमारा संघर्ष दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए है।” लेकिन आज के भाषण में यह सभी बाते गायब थी। दलित पूछ रहा है कि आज उस संघर्ष की आवाज़ क्यों ख़ामोश है? क्या भाजपा से डरती हैं मायावती। आज के भाषण में इतनी लाचारी और भय क्यों। लेकिन 2024 के आम लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने बिलकुल साफ़ दिखा दिया कि अब झुकने और चुप रहने वाली राजनीति नहीं चलेगी। 
अब PDA यानि पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक वर्ग मजबूती के साथ एक सूत्र में बंधा हुआ है। और यही ताक़त तानाशाही को हराएगी। यही वजह है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी जीरो पर  और अखिलेश यादव ने अपनी समाजवादी पार्टी को देश की तीसरी बड़ी पार्टी बनाकर खड़ा कर दिया। 

मायावती के भाषण से नाराज अली ज़मीर नामक एक्स यूज़र लिखते है: वाह बहनजी मौजूदा सरकार से नहीं पूछा कि दलित समाज पर अत्याचार पर ये सरकार सख्त कार्यवाही क्यों नहीं करती। एक बाल्मीकि की रायबरेली में हुई हत्या  पर इस सरकार ने कोई कार्यवाही क्यों नहीं की। बहनजी इस सरकार से सवाल करने में डर लगता है आपको। 

सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने मायावती के कांग्रेस पर हमले के जवाब में कहा कि मायावती कांग्रेस पर हमला किसलिए बोल रही है। हमला तो उनपर बोलना चाहिए जो सत्ता में है। जिनके शासन काल में काला दिन लिखा गया। जिनकी सरकार में दलित सीजेआई पर जूता फेंका गया। कुल दलित उत्पीड़न में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 36 फीसदी है। दस साल में सौ गुना शिक्षा महँगी कर दी। जबकि कांग्रेस ने तो बाबा साहेब के सपनो को साकार किया है। 

बसपा प्रमुख मायावती की रैली पर कांग्रेस नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा, “यह समझ से परे है कि मायावती कांग्रेस, सपा और चंद्रशेखर आज़ाद की आलोचना करती हैं, जबकि भाजपा की तारीफ़ करती हैं। यह रैली सिर्फ़ बसपा की नहीं है; यह बसपा और भाजपा की संयुक्त रैली है। पूरी सरकारी मशीनरी इसमें झोंक दी गई है। 

एक और एक्स हैंडलर यूजर है सतीश यादव। सतीश यादव लिखते है कि मै मायावती से पूछना चाहता हूँ कि आप दलितों की बड़ी नेता होकर भी रायबरेली के इस हरिओम की मोब लिंचिंग से हुई मौत पर एक भी शब्द क्यों नहीं बोली। 

पिंटू यादव लिखते है: मैडम जी 2017 के बाद पीडीए समाज पर जितने अत्याचार हुए, उतनी ख़ामोशी बसपा की रही। जब जनता पर वार होता है तब आपकी आवाज क्यों नहीं उठती। बीजेपी का दबाव पड़ते ही अखिलेश जी याद आते है। अखिलेश यादव ने हर मोर्चे पर डटकर लड़ाई लड़ी यही असली नेतृत्व है न की मौन तमाशा। 

अशरफ हुसैन नामक एक्स हैंडल यूजर लिखते है: यूपी की वर्तमान सरकार ने अनेकों जगहों के नाम बदल दिए। रायबरेली में इतनी बड़ी घटना हो गई। दलित चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया साहेब की खबर वायरल है। लेकिन मायावती जी को अखिलेश यादव से सवाल करना है। 

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि बहनजी ने उत्तर प्रदेश की उस भाजपा सरकार को अच्छा बताया जिसके कार्यकाल में यूपी दलित उत्पीड़न और अपराध में न. 1 बना हुआ है। उम्मीद थी कि वो दो शब्द रायबरेली में दलित साथी हरिओम की क्रूर हत्या पर भी बोलेंगी। और दलित चीफ जस्टिस पर जूता फेंकने की भी निंदा करेंगी। पर वो कुछ नहीं बोलीं। 

अगर 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार दोगली और ख़राब थी तो फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन क्यों किया। 2014 में अपने बलबूते चुनाव में उतरी और एक बह सीट नहीं जित पाई इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की अनुकंपा से 10 सीटें अपनी झोली में डाल ली। तब समाजवादी पार्टी में कमी नहीं नजर आई। तब तो अखिलेश यादव मायावती को बुरे नहीं लगे थे। यह नहीं भूलना चाहिए कि अखिलेश यादव ने ही मायावती को 0 से 10 सीटों तक पहुँचाया था। और आज जब भाजपा सरकार संविधान को कमजोर कर रही है, दलितों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं, तो उसी मंच से आपने अखिलेश यादव को दोगला कहती है। आखिर मायावती इतना दोगलापन कहाँ से लाती है। दलितों पर लगातार जुल्म हो रहा है लेकिन वर्तमान सरकार पर ऊँगली उठाने की बजाये धन्यवाद दे रही है। वास्तव में दलितों को आज की मायावती से ऐसी उम्मीद नहीं थी। पुरे प्रदेश से जो दलित और बसपा से जुड़े अन्य नेता और कार्यकर्ता मायावती की रैली में शामिल होने के लिए लखनऊ पहुंचे थे उन्हें बड़ी निराशा हाथ लगी। क्योंकि जिन तेवरों के लिए मायावती जानी जाती थी आज की रैली में वो मायावती गायब थी। मायावती का भाषण सुनकर ऐसा लगा जैसा कोई डरा सहमा व्यक्ति किसी और का लिखा इमला पढ़ रहा हो। एक बेचारगी और लाचारी मायावती के भाषण के दौरान उनके चेहरे पर दिखी। आपको याद होगा 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरन मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने एक चुनावी रैली में केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की योगी सरकार की भारी आलोचना की जिसके चलते मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को भाजपा सरकार की आलोचना करने पर पार्टी से ही बाहर निकाल दिया था।

मायावती की आज की रैली के बारे में सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं से भरा पड़ा है। ज्यादातर लोगो ने मायावती के भाषण की आलोचना ही की है। 

केशव देव मौर्या अपने एक्स हैंडल पर लिखते है: अब बसपा का कोई भी नेता भाजपा के विरोध में नहीं बोल सकता है। आज समझ में आया कि आकाश आनंद को बहुजन समाज पार्टी से बहन कुमारी मायावती जी ने क्यों निकाला था। क्योंकि आकाश आनंद ने भाजपा के खिलाफ कठोर भाषण दिया था। 

शुभम वर्मा लिखते है आपसे अच्छा शासन कोई नहीं चला सकता। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन आप अपने लोगों को भूल चुकी है। उनकी तख़लीफ़ें उनकी उम्मीदें आप से है। आप बीजेपी को हिडन सपोर्ट करती है। यह बहुत बड़ा पक्ष जिस और जायेगा सत्ता उसकी होगी। एक बार फिर से पूरी कोशिश से मैदान में उतरे और उत्तर प्रदेश को बचाये। 

केपी पाठक लिखते है बहनजी के भाषण सुनने के बाद यह तय हो गया है कि बीजेपी ला बी टीम है बसपा। 

प्रमोद पटेल रिपोर्टर लिखते है कि आपकी पार्टी संघर्षों से दूर हो गई है। आपके व्यवहार से क्षुब्ध होकर आपके वरिष्ठ पार्टी से निकल गए है। आप अकेली पड़ गई है। भाजपा एससी एसटी और ओबीसी का हक़ लूट रही है और आप भाजपा की तारीफ कर रही है जो उचित नहीं है। 

अमित पटेल ने लिखा कि जब दलित बच्चियों का रेप होता है। जब दलित युवको के मुंह पर पे..  किया जाता है तो मायावती जी शांत रहती है। लेकिन अपनी सभा में वर्तमान राज्य सरकार का आभार प्रकट करना नहीं भूलती।

नमस्कार। मेरा नाम है पीके वर्मा

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